पानीपत दिवस के पीछे है एक शौर्य का जीवंत इतिहास

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1757 का भारत, इसमें कुछ बड़े प्रभावशाली परिवार है पहला है पेशवा परिवार, जिनकी मुट्ठी में पूरा हिंदुस्तान था। पुणे के शनिवारवाड़ा में पेशवा बालाजीराव, अपने दो छोटे भाई राघोबा, शमशेर बहादुर तथा चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ के साथ थे और पूरे भारत के सम्राट बन चुके थे।
दूसरा है ग्वालियर का सिंधिया वंश, जिनके राजा है जानकोजी सिंधिया और उनके तीन काका। पेशवाओ की ओर से यह परिवार पंजाब और राजपूताने के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है।
तीसरे है इंदौर के राजा मल्हारराव होल्कर, जो आयु से वृद्ध है मगर मराठा साम्राज्य में उनका बड़ा स्थान है। इसके अतिरिक्त दो परिवार और है बड़ौदा के राजा दामाजी गायकवाड़ और नागपुर के राजा जनोजी भौसले।
लुटेरे अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब को अफगानिस्तान में मिलाने का सपना देखा था। मगर 1757 में राघोबा के हाथों पराजित हुआ, 1760 में अपना अधूरा सपना पूरा करने वो फिर भारत आया। उसने दत्ताजी सिंधिया को धोखे से मरवा दिया और पंजाब पर कब्जा कर लिया।
अब्दाली ने दिल्ली जीत ली और उत्तराखंड में घुस गया। इस पर शनिवारवाड़ा भड़क उठा, पेशवा ने अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ को दिल्ली के लिये भेजा तथा ग्वालियर, इंदौर, नागपुर और बड़ौदा को भी युद्ध के लिये आदेश पत्र भेज दिया।
संयुक्त मराठा सेना दिल्ली पहुँची और अफगानों को भगाकर उसे फिर से जीत लिया। भाऊ को धन की आवश्यकता थी अतः उन्होंने लाल किले और मुगलो के घर लूटने शुरू कर दिए। इसके साथ ही वे कुंजपुरा पहुँच गए और अब्दाली ने जो कुछ लुटा था उसे हासिल किया। पर इस समय तक उनके पास खाने को कुछ नही बचा। सिखों ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया, पर इससे पहले वे पंजाब पहुँचते पीछे से अब्दाली आ गया।
अब मराठे फस चुके थे, आज ही के दिन 14 जनवरी 1761 को दोनो सेनाएं पानीपत में आमने सामने आयी, भूखे प्यासे मराठो ने अफगानों के छक्के छुड़ा दिए। आधे दिन मराठे विजयी हुए परन्तु अचानक बंदूक की एक गोली पेशवा पुत्र विश्वासराव के सिर पर आकर लगी और उनकी मृत्यु हो गयी।
मराठो में हाहाकार मच गया और अनुशासन भंग होने लगा थोड़ी बहुत कसर थी वो बडौदा से आयी गायकवाड़ सेना से पूरी कर दी। पिलाजी गायकवाड़ पेशवाओ के बने नियम तोड़कर अब्दाली से सीधे लड़ने जा पहुँचे नतीजा यह हुआ कि मराठा तोप अपना कमाल नही दिखा सकी।
भाऊ और शमशेर बहादुर वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि मल्हारराव होल्कर मराठा स्त्रियों को लेकर युद्ध भूमि से निकल गए। वही जानकोजी सिंधिया को अफगानों ने कैद कर लिया और बेरहमी से मार डाला, दूसरी ओर पेशवाओ का तोपची इब्राहिम खान गार्दी सच्चा देशभक्त सिद्ध हुआ उसे अफगानों ने तीन दिन तक बुरी तरह तड़पाकर मार डाला।
अब्दाली की जीत हुई पर भयंकर नुकसान हुआ, पीछे से पेशवा ने पुणे से सेना का एक और जत्था भेज दिया जिसकी खबर सुनते ही अब्दाली के कान खड़े हो गए और वो भारत से भाग गया तथा कभी नही लौटा। हालांकि अब्दाली ने लाहौर पर कब्जा बनाये रखा और मराठो को दिल्ली तक सिमट दिया।
सिंधिया वंश का संहार हुआ मगर उसके एक सदस्य महादजी सिंधिया जीवित बच गए और यह अब्दाली की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। महादजी सिंधिया ने मराठो की खोई हुई प्रतिष्ठा फिर से स्थापित की, 1771 में महादजी ने अफगानी मुसलमानों को भारत से खदेड़ दिया।
1799 में सिखों ने पंजाब को फिर से भारत से जोड़ दिया। वैसे तो मराठो ने फिर से खुद को स्थापित कर लिया था मगर तब तक अंग्रेज अपना फन उठा चुके थे और सभी प्रभावशाली मराठे मारे जा चुके थे। यही पहलू इस देश का दुर्भाग्य था।
मराठो ने सपना देखा था कि अटक जीतने के बाद वे धीरे धीरे भारत को सम्पूर्ण हिन्दुराष्ट्र बना लेंगे पर यह अधूरा रह गया। जो समय हिन्दुराष्ट्र बनाने में प्रयोग होता वह पुनः स्थापना में लग गया इसलिए पानीपत का यह युद्ध सदैव इस बात की शिक्षा देता है कि जहाँ आपने थोड़ा भी अनुशासन भंग किया वहाँ पतन निश्चित है।
पानीपत को मैं मराठो की पराजय नही कहूंगा, क्योकि उन्होंने अब्दाली को भारत से भगा दिया था साथ ही दिल्ली पर अपनी पकड़ बनाये रखी अन्यथा इतिहास यही कहता कि ये तो मुगलो का देश है। भारत को एकसूत्र में बांधने का जो श्रेय अंग्रेजो को हासिल हुआ वह मराठो को हासिल होता यदि पानीपत ना होता। पानीपत में वीरगति को प्राप्त हुए मराठा सैनिकों को शत शत नमन! ।।सदाशिव राव भाऊ पेशवा अमर रहे।।
(परख सक्सेना)

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