तुम क्या हो मेरे लिए !

तुम क्या हो मेरे लिए 
तुम जानते हो या नहीं 
नहीं पता मुझे 
मैं भी शायद कहां जानती हूं
जानती हूं बस इतना कि 
तुम सखा हो मेरे 
विश्वास हो मेरे 
तुमसे मिलकर 
ज़िन्दगी पर फिर से भरोसा हुआ मुझे
जानती हूं मैं तुम्हारी कुछ भी नहीं 
शायद मैं समझा ही नहीं सकती 
कुछ भी दुनिया के पैमाने से 
और रस्मों के शब्दों से 
देखो … मैं नहीं बाधूंगी तुम्हें अपने शब्दों से 
और ना ही किसी वादे से 
तुम झरने से निरंतर झरते रहो अपने मन से 
और मैं भी तो नदियां सी बह रही निरंतर 
बिन बोले भी एक मौन संवाद है 
जो सम्पूर्ण सृष्टि में गूंज रहा है 
बिन बांधे भी एक जुड़ाव है 
जो हमारे दरम्यान सारी दूरियों को खत्म करता है 
भोले बच्चे से हम दोनों 
दिखाते एक दूसरे को अपनी अपनी अकड़ 
और रूठ जाते , फिर कुछ पल बाद फिर से जुड़ जाते 
तुम्हारे डांटने से अश्कों का समुंदर बहता मेरी आंखों से 
पल पल मेरा दिल चटकता तुम्हारे गुस्से से 
पर फिर भी तुमसे दूर ना होता 
जानती हूं मैं अपनी सरहदों को 
रहूंगी दूर तुमसे सदा 
बस एक बात सच सच बताना 
क्या तुम रह पाओगे दूर मुझसे 
कर पाओगे मुझे अपने दिल से दूर 
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि 
सूरज की तरह तुम हमेशा चमकते रहो 
जीवन के मधुवन में प्रेम और समृद्धि से परिपूर्ण रहो 
सफलता के नित नए आयाम रचो 
और फूलों सा हर पल मुस्कराते रहो !!!!!