UP Test 2022: कैप्टन योगी बनाम सब – क्या होगा यूपी में?

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सबकी नज़र है यूपी पर. सबको पता भी है परिणाम क्या होगा.. लेकिन लोगों को  डर है कि जनता का कोई भरोसा नहीं. वैसे ये डर चुनाव-विश्लेषकों को भी है.

यूपी में क्या होगा इसको तार्किक ढंग से भी देखा जा सकता है और भावनात्मक रूप से भी सोचा जा सकता है. और इन दोनों का ही परिणाम एक जैसा ही दृष्टिगत हो रहा है. तार्किक ढंग से यदि हम देखें तो हम दो -तीन अहम बातों को सामने रख कर चलेंगे और भावनात्मक रूप से आकलन करेंगे तो हम उस छवि को आधार बना कर सोचेंगे जो हमारे मानस में है और जो प्रदेश की जनता के मन में है.

चलिए पहले तार्किक ढंग से देखते हैं

तार्किक ढंग से देखने में तीन चीज़ें महत्वपूर्ण होती हैं किसी भी प्रादेशिक चुनवा में. पहला तो ओपिनियन पोल, दूसरा प्रदेश सरकार द्वारा किये गए कार्य, तीसरा इंकम्बेंसी फैक्टर. ऐस में ओपिनयन पोल की पहले बात कर लेते हैं. ओपिनियन पोल के बारे में .ये मान के चला जाता है कि वे पूरी तरह से शुद्ध है, ईमानदारी से लोगों के पास जा कर पूछा गया है. और आंकड़ों पर आधारित होने के बाद भी वे सैम्पल पर आधारित होते हैं – समग्रता पर नहीं. इसलिए ही वे अधिकतर गलत निकल जाते हैं. पर फिलहाल यदि हम ओपिनियन पोल की बात करें तो आंकड़े बताते हैं कि योगी वापस आ रहे हैं और बेहतर ढंग से वापस आ रहे हैं.

काम की बात देखिये

योगी सरकार इस सबसे अहम् फैक्टर को सामने रख कर बात करने पर फिर से अव्वल नंबर पर दिखाई देती है. एक बात जो किसी ने नहीं कही लेकिन यदि हम कहें तो आप सोचने पर अवश्य विवश हो जाएंगे. और वो ये कि प्रारम्भ से अब तक उत्तर प्रदेश में जितनी सरकारें बनी हैं उन सबके काम उठा कर देख लें और सामने रखें योगी जी का काम – तो साफ़ नज़र आता है कि पांच साल में अब तक सबसे ज्यादा किसी मुख़्यमंत्री ने काम किया है तो वो हैं उत्तर प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ.

जैसा घर होता है लगभग वैसा ही शहर होता है और उसका ही विस्तार प्रदेश के रूप में दृष्टिगत होता है. इस तरह से कहा जा सकता है घर के लोगों को जो चाहिए वही शहर के लोगों को चाहिए और वही प्रदेश के लोगों को भी चाहिए. ऐसे में देखा जाए तो घर के काम तो खत्म ही नहीं होते. और घर के कामों की लिस्ट बनाने बैठें तो एक लम्बी लिस्ट तैयार हो जाती है. फिर भी अगर जरूरी कामों को पहले रख कर सोचें तो जो लिस्ट बनती है उसमे सबसे पहले आता है हमारी सुरक्षा और यूपी की योगी सरकार ने अपने प्रदेश के लोगों को सबसे जरूरी वस्तु सुरक्षा के रूप में उपलब्ध कराई है. इसके आलावा बिजली पानी आदि अहम क्षेत्रों में भी प्रदेश सरकार कार्य करती है और पिछली सरकारों की तुलना में बेहतर काम किया है.

इंकम्बेंसी फैक्टर भी तो है

अब बात करते हैं इंकम्बेंसी की. चुनाव विश्लेषक भी इस फैक्टर को बहुत महत्व देते हैं और इतिहास ने भी स्वतंत्र भारत के प्रदेश चुनावों में इस फैक्टर को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाया है. इनकंबेन्सी अर्थात जो इस बार पद पर कार्य करता रहा है वह कहलाता है इंकमबेंट. इंकम्बेंसी फैक्टर चुनाव में इस तरह कार्य करता है कि इस बार जो पद पर है अगली बार वो नहीं रहेगा या तो उसका विपक्ष होगा या कोई और व्यक्ति होगा. यह बहुत स्वाभाविक है क्योंकि आमतौर पर पद पर बैठने के बाद देश के नेता सोते हुए या भ्र्ष्टाचार करते हुए समय नष्ट करते हैं. काम करते हुए बहुत कम ही नेता पाए जाते हैं. इसलिए अनिवार्य रूप से जनता इनसे खिन्न हो कर नए व्यक्ति को लाती है कि हो सकता है ये काम करे.  राष्ट्रीय चुनावों में इन्कंबेंसी फैक्टर कम काम करता है क्योंकि तब वोटर राष्ट्रीय होता है जो राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सरकार की छवि और और उसके काम को लेकर आकलन करता है और उस दृष्टि से ही मतदान करता है.

यूपी में इंकम्बेंसी का असर

इंकम्बेंसी का असर हर चुनाव में होता है और हर नेता पर होता है. पर वे नेता जो तृण-मूल स्तर पर जनता से जुड़े होते हैं -उनकी संवेदना को समझते हैं और जनहित में अपने कर्तव्यों का सत्यनिष्ठा के साथ निष्पादन करते हैं – उन पर इंकम्बेंसी काम नहीं करती. ऐसे नेताओं को जनता ईश्वर का आशीर्वाद मान कर बार बार आमंत्रित करना चाहती है. इस बार यही होना है. भाजपा के हर नेता को लेकर तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इन यूपी चुनावों में भाजपा के अधिकांश नेताओं को जनता वापस चाहती है.

भावनात्मक रुझान का क्या?

भावनात्मक रुझान छवि पर आधारित होते हैं. छवि एक दिन में न बनती है न बिगड़ती है. ऐसे में पांच साल काम करने वाले लोगों की छवि निश्चित ही उन लोगों से अच्छी बनती है जो सिर्फ जबानी जमा खर्च करते हैं. जनता के बीच काम करने वाली पार्टी को लोगों की सहानुभूति मिलती है और जो विपक्षी दल सिर्फ विरोध करने की जिम्मेदारी निभाते हैं -जनता उनको खारिज कर देती है. ख़ारिज किये गए नेता फूंके हुए कारतूस से ज्यादा भारी नहीं होते. हालांकि वे पब्लिक में शोर यही मचाते हैं कि उनका बड़ा जोर है और उनकी हवा चल रही है और इस बार वे जोरदार तरीके से वापसी करेंगे. लेकिन ये उनका ट्रिक ऑफ़ ट्रेड है पर उनको भी पता है गेंद वोटिंग के दिन तक जनता के पाले में होती है.

छवि क्या है कैसी है नेताओं की?

यूपी के चुनाव में भी दुनिया के हर चुनाव की तरह ही छवि बहुत महत्वपूर्ण कारक है – सफल और असफल होने का. ऐसे में कैप्टेन योगी की छवि मोदी की भाँती उज्जवल है. भ्र्ष्टाचार में आकंठ डूबे प्रदेश और देश के दुसरे नेताओं की तुलना में भाजपा के नेता भी भ्रष्टाचार के आरोपों के दागी नहीं हैं. उनके विरोधियों को कष्ट इसी बात से है और यही कष्ट डबल कष्ट में बदल जाता है जब विपक्षी देखते हैं कि बेदाग़ छवि वाली प्रदेश सरकार ने काम भी बहुत किया है. परन्तु थोथा चना बाजे घना. अंदर से खाली ये विपक्षी नेता अपने गाल बजाते हैं और आवाज़ों के ढोल भी जम कर बजाते हैं कि जनता ने हमको ही चुना है और इस बार कुर्सी के दूल्हा हम ही बनेंगे. पर यथार्थ के कठोर धरातल पर निकम्मापन अक्सर ख़ारिज कर दिया जाता है.

यूपी की जनभावना क्या है?

यूपी चुनावों की जनभावना चुनाव के दिनों से पहले के मुकाबले चुनाव के दिनों में अधिक अहम होती है. आज इस जनभावना को देखें तो पलड़ा योगी का भारी दिखाई देता है. कुछ ओपिनियन पोल्स में योगी को कमजोर हुआ बताया  गया है -जबकि सच तो ये है कि योगी पहले और ज्यादा वजनदार हुए हैं. यूपी की जनभावना ओपिनियन पोल में नज़र नहीं आएगी, इसके लिए गाँव में जाकर आम आदमी बन कर आम ग्रामीण के साथ बैठ कर चाय पीनी होगी. तभी दिल की बात आपको समझ में आएगी- कारण स्पष्ट है -जैसे जीवन और कर्मों में सीधे और सादे योगी जी हैं उतने ही सीधे और सादे आमतौर पर यूपी के ग्रामीण जन भी हैं. इसलिए इस सादगी को जवाब भी सादगी से मिलेगा -कोई चालाकी न इधर होगी न उधर. योगी तो वापस आएंगे और यही जनभावना है उत्तर प्रदेश की आम जनता की.