वास्तव में नित्य आते हैं श्रीकृष्ण निधिवन में रास रचाने

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निधिवन वृंदावन का वह दिव्य स्थान है जहां आज भी प्रत्येक रात्रि को भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ नित्य रास करते हैं। निधिवन ही श्रीबांकेबिहारीजी का प्राकट्य स्थल भी है; जहां ललितासखी के अवतार श्रीहरिदासजी की संगीत साधना से श्रीराधा-कृष्ण एक कुंज से प्रकट हुए और अपने भक्तों को दर्शन सुलभ कराने के लिए हरिदासजी के अनुरोध पर राधा-कृष्ण एक होकर बांकेबिहारीजी के श्रीविग्रह के रुप में परिवर्तित हो गए जो आज भी श्रीबांकेबिहारी मंदिर में वर्तमान हैं।

ऐसे पड़ा निधिवन नाम

श्रीबांकेबिहारीजी रूप परम निधि का प्राकट्य स्थल होने से ही इसे निधिवन कहते हैं। रसिक संत संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदासजी की संगीत साधना से निधिवन में श्रीबांकेबिहारीजी का प्राकट्य हुआ अतः यह बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल एवं हरिदासजी की साधना स्थली है। निधिवन के समीप ही स्थित यमुनाजी में नित्य स्नान करके स्वामी हरिदासजी यहीं पर प्रिया प्रियतम की साधना में लीन रहते थे। स्वामी हरिदासजी का समाधि मंदिर भी निधिवन के इन्हीं घने कुंजों के अंदर बना है। हरिदासजी को ललितासखी का अवतार माना जाता है जो कि संगीत की अधिष्ठात्री हैं।

परम दिव्य है निधिवन

निधिवन में आज भी भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक रात्रि को गोपियों के साथ नित्य रास करते हैं। रास का तात्पर्य स्थूल देह का मिलन नहीं अपितु आत्मा से आत्मा का मिलन है उस दिव्य आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। वह आनंद अनिर्वचनीय है तथा केवल अनुभव का विषय है वह वर्णन में नहीं आता। निधिवन में नित्य रास होने के कई प्रमाण हैं रात्रि को वहां कोई नहीं रह सकता मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी, जीव-जंतु तक सूर्यास्त के बाद निधिवन को छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, पास के मकानों की खिड़कियां बंद कर दी जाती हैं, कारण कि उस अलौकिक रासलीला को देखने का स्थूल शरीर से कोई भी अधिकारी नहीं है। यदि कोई वहां रुक भी जाता है तो उस दिव्य रास को देखकर या तो वह पागल, गूंगा-बहरा हो जाता है, या उसका शरीर छूट जाता है। जो बड़े-बड़े सिद्ध संत हैं उन्होंने निधिवन से राधाजी और गोपियों के नूपुरों की ध्वनि सुनी है। निधिवन के अंदर ही वह स्थान है जहां पर बैठकर हरिदासजी संगीत के द्वारा प्रिया-पियतम को रिझाते थे और प्रिया-प्रीतम उनकी गोद में खेला करते थे।

पीने का जल है ललिता कुण्ड

निधिवन में प्रवेश करने पर सबसे पहले दाएं हाथ की ओर ललिता कुण्ड है। इस कुण्ड के बारे में कहा जाता है कि एक रात्रि जब भगवान् गोपियों के साथ रास कर रहे थे, तभी कुछ गोपियों को प्यास लगी अतः भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी बंशी से यह कुण्ड खोदा और पानी पिलाकर उनकी प्यास बुझाई

आगे है प्राकट्य स्थल

ललिता कुण्ड से आगे चलने पर श्रीबांकेबिहारी प्राकट्य स्थल पड़ता है, यहां पर हरिदासजी की संगीत साधना से श्रीराधा-कृष्ण प्रकट हुए और हरिदासजी के आग्रह करने पर सभी भक्तों को दर्शन देने के लिए राधा-कृष्ण एक होकर श्रीबांकेबिहारीजी के श्रीविग्रह के रूप में प्रकट हुए जो आज भी बांकेबिहारी मंदिर में वर्तमान है। यह विग्रह साक्षात श्रीराधा-कृष्ण का ही स्वरूप है यह न कहीं से मंगाया है ना किसी ने बनाया है।

फिर आता है रंग-महल

बांके बिहारी जी प्राकट्य स्थल से आगे चलने पर रंग महल पड़ता है। यह छोटा सा मंदिर है जिसमें श्रीराधा-कृष्ण के चित्रपट लगे हुए हैं। यहां नित्यप्रति संध्या को भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के लिए सुंदर सेज सजाई जाती है, श्रंगार का सारा सामान रखा जाता है, पान का बीड़ा, जल, दांतुन इत्यादि सामग्रियां रखी जाती है; जिसका भाव यह रहता है कि रास करते समय अथवा रास के पश्चात भगवान् विश्राम कर सकें और भूख लगने पर भोग ग्रहण कर सकें तथा पान चबाकर दांतुन भी कर सके। यह प्रसिद्ध है कि यहां के तुलसी के पेड़ अलौकिक हैं जो रात्रि में गोपी रूप में परिणत होकर श्रीकृष्ण के साथ रास क्रीडा करते हैं और दिन में पुनः वृक्ष बन जाते हैं। प्रत्येक रात्रि श्रीराधा-कृष्ण रास करने के पश्चात रंग-महल में विश्राम करते हैं पान का बीड़ा लड्डू जल इत्यादि का सेवन करते हैं और फिर दातुन भी करते हैं। सुबह के समय जब रंगमहल को खोला जाता है; सारा सामान अस्त-व्यस्त मिलता है। और इसी कारण से बांकेबिहारी मंदिर में भगवान् को सुबह नहीं जगाया जाता कारण कि वह रात को रास करके आते हैं।

वंशी चुराई थी राधारानी ने 

रंग महल से निकलकर आगे चलने पर वंशी चोर राधा रानी मंदिर है। इस मंदिर के बारे में जनश्रुति है कि एक बार राधा-रानी ने इसी स्थान पर भगवान् श्रीकृष्ण की वंशी को इसलिए चुरा लिया था क्योंकि राधा रानी को ऐसा प्रतीत हुआ कि भगवान् हर समय वंशी को साथ रखते हैं और इसी के कारण हमारी ओर ध्यान नहीं देते हैं।

विट्ठल नाथ समाधि भी यहीं है

संगीत सम्राट श्रीहरिदासजी के ममेरे भाई विट्ठलनाथजी की समाधि भी यहीं स्थित है।

 

(प्रस्तुति: पंडित अनिल वत्स)