बहुत दर्द देता है एक सपने का टूट जाना !!

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एक सपने का अंत हुआ. करोड़ों भारतीयों की आशाएं ध्वस्त हो गईं. अब विश्व कप भारत नहीं आएगा. भारत वर्ल्ड कप हार गया.

दस जुलाई की शाम सारा देश स्तब्ध रह गया. लोग शायद विशवास कर नहीं पा रहे थे कि ऐसा भी हो सकता है. करोड़ों लोग सदमे में आ गए और कोई भी कुछ कह पाने में असमर्थ है कि भारत आखिर कैसे हार गया?

अभी दो चार दिन लगेंगे इस सदमें से उबरने में. सवाल सदमें का नहीं, यकीन का है. अभी तो यकीन ही नहीं हो पा रहा कि हम विश्व कप से बाहर हो गए हैं जबकि हम बस एक कदम दूर थे विश्व कप से. हर कोई कुछ न कुछ सोचने में लगा है. हार का कारण समझ तो नहीं आ रहा लेकिन कोई न कोई कारण हर कोई ढूंढ रहा है.

कुछ का सोचना है कि पिच खराब थी और भारतीय बल्लेबाज़ इस खराब पिच के शिकार हो गए. कुछ ने सोचा कि शुरूआती बल्लेबाज़ों ने अच्छा नहीं खेला. कुछ ने अति-आत्मविश्वास को हार की वजह माना. कुछ ने ऋषभ पंत के खराब शॉट को ज़िम्मेदार माना कि जब उसे पता था कि दो सौ पचास बॉल्स अभी खेलनी हैं, जल्दबाज़ी की क्या ज़रूरत थी? कुछ ने समझा कि शायद भारत का दिन ठीक नहीं था और कुछ ने तो ये भी सोचा कि शायद विश्व कप कोहली की किस्मत में नहीं था.

हम ने ये देखा कि कप आधा खाली था. हमने ये नहीं देखा कि कप आधा भरा भी था. भारत अगर पराजित हुआ तो संघर्ष करते हुए पराजित हुआ. भारत ने हार आसानी से नहीं मान ली और तीन रन पर तीन विकेट या बानबे रनों पर छह विकेट हो जाने पर भी आत्मसमर्पण नहीं किया. कोशिश तो आखिरी बॉल तक मुकाबला करने की थी, लेकिन बस एक चूक हुई धोनी से, जिसका उनको ध्यान नहीं रहा. क्रिकेट के बेसिक्स में सिखाया जाता है कि तेज़ रन लेते समय बैट को आगे ज़मीन पर घिसते हुए रन लिया जाता है. कोई बात नहीं, परिस्थिति इतनी रोमांचक थी कि यदि बेसिक्स का ध्यान न भी रहा तो कोई गुनाह नहीं हो गया.

सर कहा था जडेजा को धोनी ने. धोनी जैसे कप्तान के मुँह से इतनी बड़ी पदवी की लाज राखी जडेजा ने. अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझा और सफलता के साथ टक्कर दी कीवी गेंदबाज़ों को. ये बात और है कि रन गति सही ढंग से बढ़ न सकी. लेकिन उस समय ज्यादा ज़रूरी जो था वो किया धोनी और जडेजा ने . मैदान में डट कर खेलना ज़रूरी था बिना विकेट गँवाए, और इन दो खिलाड़ियों ने वही किया. धोनी का केलकुलेशन ठीक चल रहा था. धोनी आखिरी दो तीन ओवर तक मैदान में जमे रहने पर विशवास करते हैं और अंतिम दो तीन ओवर्स में कूट-नीति का परिचय देते हुए ज़रूरी रन कूट देते हैं.

पर गलती ये हुई कि एक तो धोनी अपना रन आउट बचा न सके न ही उनके बाद ऐसे कोई बल्लेबाज़ बचे थे जो मैच बचा सकते. तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है टीम इण्डिया ने मुकाबला जम कर किया भले ही परिणाम वो नहीं मिला जिसकी हम सबको चाहत थी. और ओवर आल भी देखें तो भारतीय टीम ने सारे मैच जीते थे जिसमे वो मैच भी शामिल है जिसे टीम इंडिया ने इंग्लैण्ड को उपहार में दिया था. सिर्फ एक ये सही मैच गलत तरीके से खेल कर भारत के सवा सौ करोड़ लोग हार गए.

मगर सच तो ये है कि यकीन करें तो आखिर कैसे करें कि हम हार गये विश्वकप..कैसे भूलें वो जो याद रखना भी मुश्किल है. सपनों का खात्मा हमेशा टुकड़ों में टूट कर क्यों होता है? सपनों और दिल का हश्र एक जैसा क्यूं होता है?

अब सपना नहीं देखेंगे क्रिकेट में अपनी जीत का, ये कसम खाई है सबने..लेकिन जख्म पुराना होते होते भर जाता है. हम फिर सब भूल कर क्रिकेट देखेंगे और टीम इंडिया का मनोबल बढ़ाते हुए जीत के नारे लगाएंगे – इंडिया.. इंडिया !!

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