Kisan Andolan: कहां पहुंचा है ‘किसानों’ का आन्दोलन छियासठ दिन बाद?

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

 

आज है तीस जनवरी 2021. आज है किसान आंदोलन का छ्यासठवां दिन. पीएम मोदी ने आज सर्वदलीय बैठक में कहा कि किसान उनसे बस एक फोनकॉल की दूरी पर हैं. प्रधानमन्त्री के इस वक्तव्य के गहरे मन्तव्य हैं जहां वे किसानों को ये आश्वस्त कर रहे हैं कि वे उनके साथ हैं वहीं वे ये भी अपेक्षा कर रहे हैं कि किसान भी उनकी तरफ बढ़ें. लेकिन यदि पीछे मुड़ कर देखें तो पीछे किसान आन्दोलन के ठंडे-गरम छियासठ दिन नज़र आते हैं.
दो माह से अधिक के इस लम्बे दौर में इस आंदोलन ने जहां सुलह समझौते की बातचीत के बहुत से मौसम देखे वहीं शांति से अशांति तक के तेवर भी दिखाए लेकिन हुआ कुछ नहीं, वही ढाक के तीन पात.
अब हालात ये हैं कि आंदोलन ने शान्ति का साथ क्या छोड़ा उम्मीद का दामन भी उनके हाथ से छूट गया है. कड़कती सर्दी और कांपती बरसात के मौसम में साठ दिन आंदोलन खींचना आसान का म नहीं था लेकिन आंदोलनकारियों ने ये कर दिखाया. पर छब्बीस जनवरी के लिए आंदोलनकारियों को सरकार से ट्रैक्टर परेड की अनुमति मिल गई और आंदोलनकारियों ने पुलिस से भी वादा कर दिया कि निर्धारित रुट पर ही ट्रैक्टर्स चलाये जाएंगे और सभी शर्तों का पालन किया जाएगा ताकि शान्ति बनी रहे.
पर बाद में आन्दोलनकारियों ने अपने सभी वादों को धता बता दी और 26 जनवरी को दिल्ली में घुसने के बाद जम कर मनमानी की. मनमानी तो छोटा सा शब्द है, किसानों ने जो किया वह हिंसा की श्रेणी में आता है जिसमें पुलिस कर्मियों को पीटना, जान से मारने की कोशिश करना, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना और आमजनों को आतंकित करना आदि कई प्रकार की अराजकता को फैलाने की कोशिश की गई.
हुआ ये कि अब दुनिया को किसान आंदोलन का असली चेहरा नज़र आ गया है और सब समझ गए हैं कि ये किसानों का आंदोलन कम है, बाकी सब कुछ बहुत ज्यादा है. दुनिया भर में साठ दिनों में पैदा हुई सहानुभूति ने आंदोलन के भविष्य की भांति दम तोड़ दिया और अब ये एक मोदी विरोधी शक्तियों का सरकार विरोधी प्रयास बन के रह गया है जो अभी भी अपनी जिद से बाज नहीं आ रहा है. शशि थरूर, राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे जैसे कई लोगों के नाम सामने आये हैं जिन पर लोगों को हिंसा करने के लिए भड़काने का आरोप है इसी तरह बताया जा रहा है कि हिंसा के बाद भारतीय किसान यूनियन के नेता टिकैत भी छिपे हुए थे और पुलिस को उनकी भी तलाश थी.
इसके बाद ही हाइवे से लगे किसान आंदोलन के क्षेत्रों पर पास के गाँवों के निवासियों ने अब दबाव बना दिया है और आन्दोलन के तंबू-बंबू उठा कर रास्ता खाली करने की मांग कर डाली है. कुल मिला कर कहें तो अब किसान आंदोलन एक अराजकता फैलाने वालों के सामूहिक प्रयास से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता है जो अब अपनी उलटी गिनती गिन रहा है.