Zindagi Beautiful: बहुत इम्तिहान देती है, बेटी जब बहू बनती है !

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घर को ब्यूटीफुल बनाने वाली एक ग्रहणी जब घर में आती है तो वह किसी की बेटी होती है लेकिन इस घर की बहू बन जाती है… शुरुआत में उसको बहुत दिनों तक गुजरना पड़ता है परीक्षाओं से.. ये परीक्षाएं होती है अपनेपन की और पराएपन की… और यह सिलसिला चलता है कई दिनों तक हर दिन हर सुबह और शाम…. जिंदगी ब्यूटीफुल में हम नए घर में आने वाली इस ब्यूटीफुल बेटी की आज बात करते हैं जिसको लिखा है श्री अशोक गुप्ता जी ने

बेटी जब शादी के मंडप से ससुराल जाती है तब पराई नहीं लगती मगर जब वह मायके आकर हाथ मुंह धोने के बाद सामने टंगे टाविल के बजाय अपने बैग से छोटे से रुमाल से मुंह पौंछती है , तब वह पराई लगती है.

जब वह रसोई के दरवाजे पर अपरिचित सी खड़ी हो जाती है , तब वह पराई लगती है.

जब वह पानी के गिलास के लिए इधर उधर आँखें घुमाती है , तब वह पराई लगती है.

जब वह पूछती है वाशिंग मशीन चलाऊँ क्या तब वह पराई लगती है.

जब टेबल पर खाना लगने के बाद भी बर्तन खोल कर नहीं देखती तब वह पराई लगती है.

जब पैसे गिनते समय अपनी नजरें चुराती है तब वह पराई लगती है.

जब बात बात पर अनावश्यक ठहाके लगाकर खुश होने का नाटक करती है तब वह पराई लगती है…..

और लौटते समय ‘अब कब आएगी’ के जवाब में ‘देखो कब आना होता है’ यह जवाब देती है, तब हमेशा के लिए पराई हो गई ऐसे लगती है.

लेकिन गाड़ी में बैठने के बाद जब वह चुपके से अपनी आंखें छुपा के सुखाने की कोशिश करती है, तो वह परायापन एक झटके में बहते हुए सामने आ जाता तब वो पराई सी नहीं लगती..

(अशोक गुप्ता)